Wednesday, August 19, 2009
खुली kitab
जिंदगी एक खली किताब की तरह होनी चाहिए .जब जो चाहे पढ़ ले.जितना हम जिंदगी को खुलकर जीते है,उतने ही हम अपने आपको हल्के महसूस करते है.जो मन में हो वाही वाणी पर हो और जो वाणी पर हो उसी अनुसार हमारे क्रियाकलाप हो.यानि मनसा वाचा कर्मना एक ही तरह हो। यह कहना और सुनना अच्छा लगता है पर इसे क्रिया रूप देने में बहुत परेशानियों से गुजरना पड़ता है। जैसा की गीता में श्रीकृष्ण जी ने कहा है-अभासेंन तू कोंतैय..............
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