प्रिय श्रीकांत की रचना इस प्रकार है-
बात पते की,पता नहीं-
क्यूँ नहीं पता-क्या पता था?
किसका पता था-पता है तो ये की
न तेरा पता था-न अपना पता था
न कल का पता था-न इस पल का पता था।
न होनी का पता था-न अनहोनी का पता था।
न अनुभव का पता था-न समय का पता था।
न बचपन का पता था-न जवानी का पता था-न बुढ़ापे का पता था।
न खाने का पता था-न सोने का पता था।
न हसने का पता था-न रोने का पता था।
इस पते को अंत करने का पता भी लापता है।
Monday, December 21, 2009
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