Monday, December 21, 2009

सूरदास

जेठ सुदी ८ संवत २०६६

अंग्रेजी तारीख ३१ मई 2००९

वार रविवार ७.२२ प्रातः

सूरदास कौन है? सूरदास वो नहीं है जो जन्मांध है या जिसके वाह्य चक्षु कम नहीं करते है। बल्कि सूरदास हम सभी है जब-

=हम अन्याय होते देखते हुए भी अपना मुह घुमा लेते है कौन झंझट मोल ले।

=हम किसी को पीड़ित देखकर भी पीड़ित नहीं होते।

=हम किसी को जमीं पर तिल -तिल मरते हुए देखते है।

=हम किसी फूल को मुस्कराते देख हँसते नहीं।

=हम किसी बहते हुए झरने को देख मन मयूर को नाचने देते नहीं।

=हम किसी बहन बेटी के विवाह में अपना तन-मन-धन देते नहीं।

=हम किसी पढाई के इच्छुक को मदद देते नहीं।

=हम किसी माँ के अंतर्मन के आंसुवो को देख सकते नहीं।

=हम किसी के दुःख को बाँटने की इच्छा रखते नहीं।

=हम किसी के सुख को बढ़ने में सामिल होते नहीं।

=हम नर में नारायण धुन्ध्ते नहीं।

=हम धन दौलत में सुख की कामना करते है।

=हम माँ की ममता,बहन के प्यार और बेटी की चाहना को पढ़ पते नहीं।

हम उस समय सूरदास होते नहीं जब-

=हम सभी के सुर में सुर मिला लेते है।

=हम शिव की तरह क्रोध के जहर को भी अपने गले लगा लेते है।

=हम सभी में राम-कृष्ण-राधा-सीता को देखते है।

=हमारे अंतर्चाक्शु काम करना शुरू कर देते है।

एक सूरदास ने कहा था-

"बांह छुडाये जाट हो निर्बल जन के मोय
हृदय से जब जावोगे तब जानुगो तोय"



सूरदास

पते की bat

प्रिय श्रीकांत की रचना इस प्रकार है-
बात पते की,पता नहीं-
क्यूँ नहीं पता-क्या पता था?
किसका पता था-पता है तो ये की
न तेरा पता था-न अपना पता था
न कल का पता था-न इस पल का पता था।
न होनी का पता था-न अनहोनी का पता था।
न अनुभव का पता था-न समय का पता था।
न बचपन का पता था-न जवानी का पता था-न बुढ़ापे का पता था।
न खाने का पता था-न सोने का पता था।
न हसने का पता था-न रोने का पता था।
इस पते को अंत करने का पता भी लापता है।

सोच की खोज

खोज रहा था-की क्या और कैसे सोचु?
सोच रहा था -की क्या और कैसे खोजू?
इसी सोच की खोज में और खोज की सोच में
खो गया वो-सो गया वो-न जाने क्यों और कैसे

Tuesday, October 6, 2009

प्रकृति की लीला बड़ी अनूठी है .बिन मांगे वो हमे धुप, हवा,पानी, फूल,पेड़,खनिज,लवण आदि देती है.पर हमे संतोष करने की आदत ही नही हैहम जो मिला उसे किस तरह प्लानिंग से खर्च करे वो नही सोचकर जो नही मिला है उसे पाने की कामना और उसे पाने के बाद कैसे खर्च करेंगे उसकी भी प्लानिंग कर डालते हैऔर जब वो नही मिलता है तो दुखी होते है.

Wednesday, August 19, 2009

खुली kitab

जिंदगी एक खली किताब की तरह होनी चाहिए .जब जो चाहे पढ़ ले.जितना हम जिंदगी को खुलकर जीते है,उतने ही हम अपने आपको हल्के महसूस करते है.जो मन में हो वाही वाणी पर हो और जो वाणी पर हो उसी अनुसार हमारे क्रियाकलाप हो.यानि मनसा वाचा कर्मना एक ही तरह हो। यह कहना और सुनना अच्छा लगता है पर इसे क्रिया रूप देने में बहुत परेशानियों से गुजरना पड़ता है। जैसा की गीता में श्रीकृष्ण जी ने कहा है-अभासेंन तू कोंतैय..............

Tuesday, June 2, 2009

समय

समय कभी ठहरता नही है .यह नदी के प्रवाह की तरह दिन रत बिना रुके भागता सा चला जा रहा है.जिंदगी इसके सामने बौनी सी नजर आती है.हम चाहकर भी इसे नही रोककर अपने मन की गति से जोड़ नही सकते

Sunday, May 17, 2009

हम tum

हम तुम से जब मिले तो जमाना हमे भूल गया और हम ज़माने को भूल गए। मै को भूलकर ही हम बनते है हम में लगता है की मै और मेरापन को आत्मसात करने की हैसियत है.